सागौन के छह गिल्टों ने खोली वन विभाग की निगरानी व्यवस्था की पोल पत्तों और पन्नी में छिपाकर रखी गई जंगल की लकड़ी बरामद, अब कर्मचारियों की भूमिका पर उठे सवाल।
4 नवंबर 2026 को तराई पश्चिमी वन प्रभाग रामनगर की पतरामपुर रेंज में सागौन की लकड़ी से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया, जिसने वन विभाग की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। जसपुर कक्ष संख्या 22 में रामपाल के घर के सामने सागौन के छह गिल्टे पत्ते और पन्नी से ढककर रखे होने की सूचना मुखबिर के माध्यम से सीधे डीएफओ पुनीत तोमर तक पहुंची। सूचना की गंभीरता को देखते हुए डीएफओ ने तत्काल रेंज अधिकारी अनुभव टम्टा को कार्रवाई के निर्देश दिए।
वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और लकड़ी बरामद कर ली। लेकिन इस कार्रवाई के साथ ही एक अहम सवाल खड़ा हो गया कि जंगल की संपत्ति आखिर एक निजी मकान के सामने जंगल के किनारे पहुंची कैसे? लकड़ी को पेड़ो के पत्तों और पन्नी से ढककर रखने की नौबत क्यों आई और विभागीय निगरानी के बावजूद इसकी जानकारी अधिकारियों तक मुखबिर के जरिए ही क्यों पहुंची?
रेंज अधिकारी अनुभव टम्टा की ओर से बताया गया कि संबंधित पेड़ कुछ दिन पहले आई आंधी में जड़ सहित गिर गए थे और उनका सी-वन रिकॉर्ड दर्ज नहीं हो पाया था। विभाग का यह स्पष्टीकरण सामने आने के बाद मामला और भी गंभीर हो जाता है। सवाल यह है कि जब पेड़ आंधी में गिर गए थे तो उनकी लकड़ी का तत्काल रिकॉर्ड क्यों नहीं बनाया गया? मौके का निरीक्षण किसने किया और गिरे हुए पेड़ों की लकड़ी को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी किस कर्मचारी की थी? इस मामले में वन रक्षक विकास कुमार की भूमिका भी जांच का विषय है। क्या उन्हें पेड़ गिरने की जानकारी थी? क्या उन्होंने इसकी रिपोर्ट रेंज कार्यालय को भेजी थी? यदि लकड़ी विभागीय संपत्ति थी तो उसे वन परिसर या चौकी में सुरक्षित रखने के बजाय रामपाल के घर के सामने जंगल के किनारे क्यों रखा गया? आखिर किसके निर्देश पर और किसकी निगरानी में यह व्यवस्था की गई? इन सवालों का जवाब विभागीय दस्तावेजों से सामने आना चाहिए, क्योंकि प्राकृतिक आपदा का हवाला देकर सरकारी संपत्ति के रख रखाव और रिकॉर्ड की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
डीएफओ पुनीत तोमर के निर्देश पर लकड़ी बरामद होना कार्रवाई का एक पहलू है, लेकिन अब इस पूरे घटनाक्रम की तह तक पहुंचना भी जरूरी है। बरामद छह गिल्टों की माप, उनकी प्रजाति, पेड़ गिरने की वास्तविक तारीख, मौके के निरीक्षण और विभागीय रिकॉर्ड की जांच होनी चाहिए।
यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि लकड़ी निजी मकान के सामने जंगल किनारे किस परिस्थिति में पहुंची और जंगल किनारे पेड़ो के पत्तों तथा पन्नी के नीचे छिपाने की जरुरत क्यों पढ़ी और क्या संबंधित कर्मचारियों ने अपने दायित्वों का निर्वहन किया या नहीं। आखिर वन विभाग की जिम्मेदारी सिर्फ जंगल में पेड़ों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि पेड़ गिरने के बाद उसकी लकड़ी का हिसाब रखना भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है। सवाल सीधा है—जब जंगल की लकड़ी विभागीय संपत्ति है तो उसके गिल्टों की निगरानी मुखबिर के भरोसे कैसे छोड़ी जा सकती है? बरामदगी के बाद अब जवाबदेही तय होनी चाहिए, क्योंकि जंगल की संपत्ति का हिसाब पन्नी के नीचे नहीं, विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए।
मेरी नजर में इस खबर की सबसे मजबूत लाइन है:
“जंगल की संपत्ति का हिसाब पन्नी के नीचे नहीं, विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए।
