उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक वैभव और चिंतन परंपराओं पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन
रोशनी पांडेय प्रधान सम्पादक
रामनगर, 11 अक्टूबर। उत्तराखंड के गौरवशाली इतिहास, धार्मिक परंपराओं और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के विविध आयामों पर गंभीर अकादमिक विमर्श के साथ पीएनजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रामनगर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का रविवार को समापन हुआ। उत्तराखंड इतिहास संकलन समिति, उत्तराखंड प्रांत एवं महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी का विषय ‘उत्तराखंड का सांस्कृतिक अतीत, धार्मिक वैभव और चिंतन धाराएँ’ रहा। महाविद्यालय के मयूर सभागार में आयोजित संगोष्ठी के तृतीय एवं चतुर्थ सत्रों में विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से आए विद्वानों और शोधार्थियों ने उत्तराखंड के इतिहास, धार्मिक मान्यताओं, लोकसंस्कृति, स्थापत्य कला तथा सामाजिक परंपराओं पर शोधपत्र प्रस्तुत किए। शोधपत्रों में आदि कैलास का धार्मिक महत्व, कोटी बनाल की पारंपरिक भूकंपरोधी स्थापत्य शैली, कटारमल सूर्य मंदिर की ऐतिहासिक विरासत, भोटिया जनजाति की सांस्कृतिक पहचान, महिला आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका, कुमाऊँनी लोकगीतों, लोकपरंपराओं तथा जनजातीय समुदायों पर पर्यटन के प्रभाव जैसे विषय प्रमुख रहे। इन प्रस्तुतियों ने उत्तराखंड की सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक चेतना के विभिन्न पक्षों को सामने रखा। समारोह के मुख्य अतिथि श्रीमान संजय सिंह, राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली ने अपने उद्बोधन में उत्तराखंड के इतिहास को उसकी सांस्कृतिक चेतना, धार्मिक परंपराओं और सामाजिक जीवन से जोड़कर समझने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इतिहास लेखन केवल अतीत की घटनाओं का संकलन नहीं, बल्कि समाज की स्मृतियों, स्थानीय परंपराओं और सांस्कृतिक अनुभवों को प्रामाणिक रूप में सामने लाने की प्रक्रिया है। उन्होंने स्थानीय इतिहास के व्यवस्थित संकलन, ऐतिहासिक तथ्यों के सत्यापन और भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास लेखन को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया। मुख्य वक्ता प्रो. के.के. पाण्डेय, पूर्व निदेशक, उच्च शिक्षा, उत्तराखंड सरकार ने उत्तराखंड की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रदेश की पहचान उसकी प्राचीन ज्ञान परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और लोकजीवन में निहित है। उन्होंने इन परंपराओं के अध्ययन को व्यापक अकादमिक परिप्रेक्ष्य में आगे बढ़ाने तथा ऐतिहासिक विरासत को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल दिया। विशिष्ट अतिथि प्रो. वी.एम. पाण्डेय, प्राचार्य, राजकीय महाविद्यालय, बेरीनाग, पिथौरागढ़ ने कहा कि उत्तराखंड की प्राचीन ज्ञान परंपराएँ, धार्मिक मान्यताएँ और लोकसंस्कृति उसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान हैं। उन्होंने इन परंपराओं के संरक्षण, ऐतिहासिक तथ्यों के शोधपरक अध्ययन और क्षेत्रीय विरासत को अकादमिक विमर्श का हिस्सा बनाने में राष्ट्रीय संगोष्ठियों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। *रामनगर के विधायक श्री दीवान सिंह बिष्ट ने अपने संबोधन में कहा कि उत्तराखंड की* ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत प्रदेश की विशिष्ट पहचान है। यहाँ की धार्मिक परंपराएँ, लोकसंस्कृति और ऐतिहासिक धरोहरें हमारी गौरवशाली परंपरा की प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि इन धरोहरों का संरक्षण और नई पीढ़ी को इनके महत्व से परिचित कराना सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने ऐसी राष्ट्रीय संगोष्ठियों को उत्तराखंड के इतिहास, संस्कृति और परंपराओं के प्रचार-प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया। महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एम.सी. पाण्डे ने अपने संबोधन में कहा कि उत्तराखंड की ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत हमारी अमूल्य धरोहर है, जिसका संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन वर्तमान पीढ़ी का महत्वपूर्ण दायित्व है। उन्होंने कहा कि लोकपरंपराओं, प्राचीन स्थापत्य कला और पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर उन्हें नई पीढ़ी तक पहुँचाना आवश्यक है। ऐसी राष्ट्रीय संगोष्ठियाँ शोधपरक दृष्टिकोण विकसित करने, युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने और विरासत के प्रति गौरवबोध उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. अभिनव तिवारी ने कहा कि आयोजन का उद्देश्य उत्तराखंड के सांस्कृतिक अतीत, धार्मिक परंपराओं और चिंतन धाराओं के विविध आयामों पर गंभीर अकादमिक विमर्श को प्रोत्साहित करना है।
उन्होंने कहा कि विभिन्न विद्वानों एवं शोधार्थियों के शोधपत्रों ने प्रदेश के इतिहास और संस्कृति को समझने के नए दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। उन्होंने आयोजन की सफलता में सहयोग देने वाले अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों और महाविद्यालय परिवार के प्रति आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी के निष्कर्ष में उत्तराखंड की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण, लोकपरंपराओं के प्रामाणिक दस्तावेजीकरण, पारंपरिक ज्ञान के संवर्धन तथा स्थानीय समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने पर बल दिया गया। संगोष्ठी ने यह संदेश दिया कि उत्तराखंड के अतीत का शोधपरक अध्ययन उसकी सांस्कृतिक अस्मिता को समझने और इस विरासत को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अल्का ने किया। इस अवसर पर प्राध्यापकगण डॉ. शलभ गुप्ता, डॉ. शरद भट्ट, डॉ. जया भट्ट, डॉ. नरेश कुमार, डॉ. नीमा राणा, डॉ. आशुतोष विक्रम, डॉ. प्रभाकर त्यागी, डॉ. विजय कुमार, डॉ. महेश आर्या एवं डॉ. बी.के. यादव सहित शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।






