जिस घर से उठी धर्म की दुहाई, उसी घर से खुलने लगी कथित काले कारनामों की फाइल करणी सेना ने प्रदेश अध्यक्ष सूरज चौधरी सहित संगठन पर भाई विपिन के सनसनीखेज आरोप।

जिस घर से उठी धर्म की दुहाई, उसी घर से खुलने लगी कथित काले कारनामों की फाइल करणी सेना ने प्रदेश अध्यक्ष सूरज चौधरी सहित संगठन पर भाई विपिन के सनसनीखेज आरोप।

 

रोशनी पांडे प्रधान संपादक 

 

जरा सोचिये, जब अपने ही परिवार के लोग आपकी कथनी और करनी को जमाने के सामने खुलेआम उजागर करते हुए कार्रवाई की मांग करने लगें, तो उन आरोपों की गंभीरता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। धर्म और समाज की रक्षा का दावा करने वालों के बीच आखिर ऐसा क्या चल रहा है कि अब अपनों को ही सामने आकर कथित काले कारनामों की पोल खोलनी पड़ रही है? उन पीड़ितों और आम लोगों के दिल पर क्या गुजरती होगी,

 

 

 

 

 

जो अपनी मेहनत की खून-पसीने की कमाई धर्म और समाज के नाम पर कथित तौर पर सूरज चौधरी जैसे लोगों की झोली में डालने को मजबूर होते हैं? जिस पैसे से गरीब परिवारों के बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम होना था, जिन मासूमों का भविष्य उज्ज्वल होना था, वही पैसा अगर कथित वसूली और दबाव की भेंट चढ़ रहा है, तो यह केवल आर्थिक शोषण का मामला नहीं, बल्कि धर्म और आस्था के नाम पर खड़े किए गए पूरे तंत्र पर गंभीर सवाल है। करणी सेना के प्रदेश अध्यक्ष सूरज चौधरी को लेकर उनके भाई विपिन चौधरी ने एक वीडियो जारी कर ऐसे आरोप लगाए हैं, जिन्होंने संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष संगठन के अन्य पदाधिकारी कार्यप्रणाली से लेकर उसके नेतृत्व तक को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। हालांकि ये आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र जांच और पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन आरोप लगाने वाला व्यक्ति जब परिवार का ही सदस्य हो तो मामला और भी गंभीर हो जाता है।

यह भी पढ़ें 👉  जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने राज्य स्थापना दिवस की तैयारियों को लेकर की समीक्षा बैठक, अधिकारियों को सौंपी जिम्मेदारियां

ऐसा नहीं है कि सूरज चौधरी का नाम पहली बार ब्लैकमेलिंग और अवैध उगाही जैसे गंभीर आरोपों के साथ चर्चा में आया हो। इससे पहले भी उनके खिलाफ इस तरह के आरोप सार्वजनिक रूप से सामने आने और संगठनात्मक कार्रवाई की खबरें चर्चा में रही हैं। आरोपों के मुताबिक, पहले आरोप लगाने के बाद बजरंग दल ने सूरज चौधरी को बाहर का रास्ता दिखा दिया था बजरंग दल से हटाए जाने के बाद सूरज चौधरी ने करणी सेना का दामन थामा और देखते ही देखते संगठन के प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंच गए। लेकिन सवाल यह है कि क्या संगठन का पद समाजसेवा की जिम्मेदारी निभाने के लिए होता है या फिर उसकी आड़ में कथित दबदबा कायम करने का जरिया बन सकता है? लोगों की आवाज उठाने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का दावा करने वाले संगठन पर ही यदि डराने-धमकाने और वसूली के आरोप लगने लगें तो उसके उद्देश्य और कार्यशैली की समीक्षा होना लाजिमी है। आरोपों के मुताबिक सूरज चौधरी ने प्रदेश अध्यक्ष के पद और संगठन के नाम का इस्तेमाल अपनी आलोचना करने वालों की आवाज दबाने के लिए किया। यानी सवाल उठाने वालों को जवाब देने के बजाय क्या उन्हें ही दबाव में लेने की कोशिश की गई? अगर ऐसा हुआ है तो यह धर्म और समाजसेवा का रास्ता नहीं बल्कि पद और प्रभाव के कथित दुरुपयोग का गंभीर उदाहरण होगा। आखिर धर्म की रक्षा के नाम पर निकले लोग यदि खुद ही सवालों के घेरे में खड़े हों, तो समाज उनसे जवाब मांगने का हक रखता है।

यह भी पढ़ें 👉  जय देवी मां स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने दीपावली के लिए तैयार किए आकर्षक ऐपण डिजाइन वाले दीये, पारंपरिक कला को बना रहीं स्वरोजगार का माध्यम*

विपिन चौधरी ने अपने वीडियो में केवल पारिवारिक रिश्ते तोड़ने की बात ही नहीं कही बल्कि करणी सेना की उत्तराखंड में कथित गतिविधियों को लेकर भी बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने साफ कहा कि अब उनका चौधरी खानदान से कोई रिश्ता नहीं है सूरज चौधरी उनके भाई नहीं हैं और न ही उनका करणी सेना से कोई संबंध है। विपिन ने आरोप लगाया कि उत्तराखंड में करणी सेना दलाली खाती है और पेड़ कटान जैसे मामलों में कथित तौर पर पैसे लिए जाते हैं। उन्होंने देहरादून, हरिद्वार और हल्द्वानी के स्पा सेंटरों में जाकर लोगों को डराने-धमकाने तथा उनसे 11 हजार, 15 हजार और 20 हजार रुपये तक की जबरन पर्चियां काटने के आरोप भी लगाए।

यह भी पढ़ें 👉  दीपक रावत की अध्यक्षता में पिथौरागढ़ विकास प्राधिकरण की सप्तम बोर्ड बैठक, विकास कार्यों पर लिए गए अहम फैसले

 

 

 

 

विपिन के मुताबिक कथित वसूली के इस खेल को बाकायदा बिजनेस बना दिया गया है। इतना ही नहीं उन्होंने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से करणी सेना पर प्रतिबंध लगाने की मांग तक कर डाली। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी? धर्म कोई कारोबार नहीं आस्था कोई वसूली का जरिया नहीं और संगठन की कुर्सी किसी को कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं देती। अगर आरोप निराधार हैं तो जांच में सच्चाई सामने आनी चाहिए, लेकिन यदि इनमें जरा भी दम है तो कार्रवाई ऐसी होनी चाहिए कि धर्म और समाजसेवा के नाम पर कथित दुकान चलाने वालों को स्पष्ट संदेश मिले।