कुमाऊँ की नारी अस्मिता और देवसंस्कृति पर बयान से बवाल, पुलिस को दी गई तहरीर, मुकदमा दर्ज।
उधम सिंह राठौर – प्रधान संपादक
हल्द्वानी। अपने आप को “ज्योति अधिकार” बताने वाली एक महिला द्वारा कुमाऊँ की महिलाओं, देवी-देवताओं और पारंपरिक लोकसंस्कृति को लेकर दिए गए आपत्तिजनक व अपमानजनक बयानों से पूरे कुमाऊँ क्षेत्र में भारी आक्रोश फैल गया है। समाज के विभिन्न वर्गों ने इन बयानों को कुमाऊँ की नारी अस्मिता, देवभूमि की आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत पर सीधा हमला बताया है।
कुमाऊँ की महिलाएं केवल उत्सवों या कौतिकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पहाड़ की सांस्कृतिक और सामाजिक आत्मा का आधार रही हैं। लोकनृत्य, पारंपरिक वेश-भूषा और देवी-देवताओं से जुड़ी आस्थाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही है। ऐसे में कौतिकों में नृत्य करने वाली महिलाओं और पहाड़ी संस्कृति के प्रति अशोभनीय शब्दों का प्रयोग पूरे समाज का अपमान माना जा रहा है।
देवी-देवताओं और लोकआस्थाओं को “फर्जी” कहे जाने पर धार्मिक और सांस्कृतिक संगठनों में भी गहरी नाराज़गी है। संगठनों का कहना है कि कुमाऊँ देवभूमि है, जहां लोकदेवताओं की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस तरह की टिप्पणियां करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के समान हैं।
महिला संगठनों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और सामाजिक संस्थाओं ने पुलिस को तहरीर सौंपते हुए संबंधित व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। साथ ही यह भी मांग उठाई जा रही है कि ऐसी मानसिकता रखने वालों का कुमाऊँ के सांस्कृतिक मेलों, कौतिकों और सामाजिक आयोजनों से सामाजिक-सांस्कृतिक बहिष्कार किया जाए।
समाज का आरोप है कि पहाड़ की पीड़ा, महिलाओं के संघर्ष और संस्कृति के नाम पर निजी प्रचार और राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है। कुमाऊँ की जनता ने साफ शब्दों में कहा है कि यहां की संस्कृति किसी की निजी जागीर नहीं है और न ही महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वालों को बर्दाश्त किया जाएगा।
कुमाऊँ समाज ने एक स्वर में कहा कि अपनी पहचान, आस्था और सांस्कृतिक गौरव पर किसी भी हमले का जवाब एकजुट होकर, लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से दिया जाएगा।






